समाज मे महिलाओ के लिए जो नियम बनाये गये है, वों किसी कुंवे से कम नहीँ इसलिए बदलते ज़माने के साथ उनके लिए अपनी सोच भी जरूर बदले
उद्देश्य :- महिला सशक्तिकरन के लिए जागरूक करना
यह समाज पहले लड़कियों और लड़कों में हीन भावना रखता था, पहले के हिसाब से अब थोड़ी राहत है क्युकि हर क्षेत्र मे बदलाव की हवा चली है, परन्तु अंतर अभी भी कायम है,
दोनों के काम काज मे मिली छुट बताती है की भेद भाव अब भी कायम है ,,,,
लोगों के सामने चाहे जो भी कहले, मगर लड़कियों को चूल्हे चौके के दायरे में रहकर ही सब कुछ करना औऱ जीना पड़ता है,
आसान नहीं होता लड़की की जिंदगी जीना, जन्म से लेकर मरने तक लोग हिसाब रखते है, कहा...गयी थी ? इतना पढ़ कर क्या करेगी ? शादी कब करोगी? वगैरह वगैरह, मगर इन सब से झूझते हुए जो आगे निकल जाये , सही अर्थो मे उसीने लड़की होकर अपना मान बढ़ाया है,
परिवार से लड़कियो को छुट पढ़ने का मिले,औऱ साथ ही सही मार्गदर्शन भी , पर लड़कियों को लड़के की तरह पूरी छूट देना सोच कर ही परिवार वालो के पसीने छुट जाते है ,चलो कोई बात नहीं !!!
पर पढ़ाई लिखाई में तो लड़कियों को मदद मिलनी चाहिए....... लेकिन अक्सर सब वही हाथ खींच लेते हैं, पर जैसे तैसे बस शादी कर के विदा कर देना ही अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी समझते हैं,
दहेज के रूप में एक मोटी रकम भी चुकाते हैं, जो कि शायद लड़कियो के हाथ कभी ना आए,,,, यह हमारी पिछडी मानसिकता के कारण ऐसा होता चला आ रहा है,
बेटियों को लड़कों की तरह ही पढ़ाना चाहिए, और जो खर्च में दहेज में कर रहे हैं उन्हें उनकी पढ़ाई पर लगा दे, तो भविष्य के लिए किसी को सोचना ना पड़े,
महिलाओं में गुण होता है अपने साथ कई परिवारों का पालन पोषण कर सके, यह कौन जन्मजात उनके अंदर रहती है, मगर उनकी शक्ति की कल्पना किए बगैर उन्हें पुरी शिक्षा से वंचित कर दिया जाता है,
औऱ यही उनकी सबसे बड़ी भूल होती है, अगर हम बच्चे को पूरी तरह से आत्मनिर्भर बना कर ब्याह दे तों,,,,उन्हें उन समझोंतों से बचाया जा सकता है, जो वे तमाम उम्र ससुराल में रहकर करती हैं,
कहीं कहीं पर लड़कियो की शादी उनके अंदर के गुण,काबिलियत,औऱ आत्मविश्वास को भी हमेशा के लिए मिट्टी मे दफन कर देते है,
उदाहरण के तौर पर अगर किसी बेटी मे अफसर,डॉक्टर,या इंजीनियर,लेखक इत्यादि बनने के गुण होते है, औऱ उनकी बगैर पुरी शिक्षा के उन्हें शादी के बंधनों मे बांधकर उनकी पढ़ाई लिखाई छुड़वा दी जाती है,
मां-बाप सोचते हैं कि मेरी बेटी वहां सुखी रहेगी,,,,,औऱ बेटियां तों होती ही है पराया धन जिसे एक ना एक दिन अपने घर जाना होता है,,,,
मगर एक अनुमान के अनुसार 100 मे मात्र 40 बेटियां ही ससुराल जाकर सुखी रहती है, बाकियो मे या तों परिवार वाले सही नहीँ रहते,,,या फिर बेटियों की किस्मत,
तो फिर हम सिर्फ एक उम्मीद पर अपनी बेटी को किसी दूसरे के हवाले कैसे कर दे, अगर आप सही मायने में मां-बाप का फर्ज निभाना चाहते हैं तो अपनी बेटियों को पूरी शिक्षा दें
उन्हें पढ़ाये लिखाये और एक कामयाब इंसान बनाये,बच्चे तों होते ही है माटी के लोए के समान,अगर सुरु से उन्हें अपने हिसाब से सांचे मे ढालना सुरु नहीँ किया तों आगे मुश्किल होगी ,ताकि क़ल वे भी अपने समाज को सवारने औऱ सुधारने मे अपना योगदान दे,
हम माँ बाप यदि बिना किसी तोल मोल के बेटे औऱ बेटियों को समान शिक्षा देने का प्रण ले ले तों हमारी बेटियों का भविष्य भी उज्जवल हो जायेगा,
उन्हें अपनी इच्छाओ की पूर्ति के लिए किसी अन्य पर आश्रित रहने की अव्सय्कता नहीँ पड़ेगी,
लडके संतान की तरह लड़कियो को भी सही मार्गदर्शन करना अनिवार्य समझना चाहिए,
क्योंकि जमाना अब बदल रहा है, साथी लोगों की सोच भी बदल नहीं है, पहले नौकरी पेशा बहु लाने में लोग कहते थे, अगर वो काम करेगी तों हमारी सेवा कौन करेगा?
मगर आज नौकरी पेशा बहू को ज्यादा तवज्जो दी जाती है, सायद अब सोच बदल गयी है,औऱ उन्हें भी कमाने वाले सदस्य की तरह देखा जाता है,
iसकी एक वजह ये है की समाज मे नई पीढ़ियों के साथ जागरूकता भी आ चुकी है, औऱ सिर्फ एक हाउस वाइफ की गिनती जेनरल की केटेगरी मे की जाने लगी है, जो सायद महिलाओ को रस ना आये,
ये तों थी घर परिवार की बात,मगर अपनी इच्छावों औऱ काबिलियत को दबा पाना आसान काम नहीँ,
इसलिए थोड़ी मेहनत कर के अपने सपनो को दोबारा उड़ान दे, औऱ भारत की बेटी के साथ एक सशक्त नारी भी बने,अगर आप के बस मे हो तों आस पास के पढ़े लिखें बालिकाओ की मदद करने मे कभी संकोच ना करे,
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